छठ सूर्योपासना का पर्व है। इसलिए इसे सूर्य षष्ठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सूर्य की उपासना उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की जाती है। सूर्यदेव की आराधना करने से व्रती को सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भगवान भास्कर की कृपा से सेहत अच्छी रहती है और घर में धन धान्य की प्राप्ति होती है। संतान प्राप्ति के लिए भी छठ पूजन का विशेष महत्व है। नदियों, तालाब या फिर किसी पोखर के किनारे पर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

छठ को पहले केवल बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता था, लेकिन अब धीरे-धीरे पूरे देश में इसके महत्व को स्वीकार कर लिया गया है। दिल्ली, मुंबई सहित देशभर में अब इस पर्व को मनाया जाता है.. इतना ही नहीं दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी छठ की छठा देखने लायक होती है..।

इस पूजा के लिए चार दिन महत्वपूर्ण हैं नहाय-खाय, खरना, डूबते सूरज को अर्घ्य और उगते हुए सूरज को अर्घ्य… छठ की पूजा में गन्ना, फल, डाला और सूप का प्रयोग किया जाता है।मान्यताओं के अनुसार, छठी मइया को भगवान सूर्य की बहन बताया गया हैं।

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लोकआस्था के इस महापर्व का अपना सामाजिक महत्व भी है। इस पर्व की सबसे बड़ी बात ये है कि इसमें धार्मिक भेदभाव, ऊंच-नीच, जात-पात भूलकर सभी एक साथ इसे मनाते हैं। किसी भी लोक परंपरा में ऐसा नहीं है।

सूर्य, जो रोशनी और जीवन के प्रमुख स्रोत हैं और ईश्वर के रूप में जो रोज सुबह दिखाई देते हैं उनकी उपासना की जाती है। इस महापर्व में शुद्धता और स्वच्छता का विशेष ख्याल रखा जाता है और कहते हैं कि इस पूजा में कोई गलती हो तो तुरंत क्षमा याचना करनी चाहिए ।

इस पर्व के दौरान छठी मइया के अलावा भगवान सूर्य की पूजा-आराधना होती है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इन दोनों की अर्चना करता है उनकी संतानों की छठी माता रक्षा करती हैं। कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। कहते हैं कि भगवान की शक्ति से ही चार दिनों का यह कठिन व्रत संपन्न हो पाता…

रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान  राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। माना जाता है कि मुंगेर के सीता चरण में मां सीता ने छह दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था  तब से छठ पूजा की शुरुआत हुई..

महाभारत काल में भी छठ महापर्व को लेकर कई घटनाओं का वर्णन मिलता है…माना जाता है कि सबसे पहले कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की थी.. कर्ण को सूर्यपुत्र भी कहा जाता है.. कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे।  सूर्यदेव की कृपा से ही कर्ण महान योद्धा बने थे।

कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने की बात सामने आती है.. कहा जाता है कि जब पांडव जुए में राज पाट हार गए थे.. तब द्रौपदी ने सूर्य की आराधान की थी.और इस पूजा के बाद पांडवों का राज वापस मिल गया था

छठ को लेकर पुराणों में भी एक कथा का वर्णन मिलता है.. इसके अनुसार राजा प्रियवद  को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यनप ने उन्हें पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने को कहा.. इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र तो प्राप्त हुआ लेकिन वो मरा हुआ पैदा हुआ.. प्रियवद पुत्र को श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और उन्हें षष्ठी व्रत करने को कहा.. राजा ने पुत्र इच्छा से देवी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता बालकों की रक्षा करने वाले विष्णु भगवान द्वारा रची माया हैं। बालक के जन्म के छठे दिन छठी मैया की पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे बच्चे की जिंदगी में  किसी प्रकार का कष्ट नहीं आए।

छठ पूजा को लेकर एक और कहानी है.. शर्याति नाम के एक राजा थे..उनकी एकमात्र संतान सुकन्या थी.. राजा अपनी पुत्री को लेकर एक दिन जंगल में शिकार खेलने गए.. जंगल में च्यवन ऋषि तपस्या कर रहे थे.. उनके शरीर पर दीमक लग गई थी.. सुकन्या ने कौतुहलवश वहां तिनके डाल दिए जिससे ऋषि की आंखे फूट गई..

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बाद में नागकन्या ने सुकन्या को सूर्य की उपासना करने को कहा..इससे च्यवन मुनि की आंखों की रौशनी फिर लौट आई

इसके साथ ही महापर्व छठ को लेकर कई चमत्कार की भी मान्यता है.. द्रौपदी के पूजा करने से पांडवों को राज पाट वापस मिलना.. कर्णं का सूर्य की आराधना करने से बड़ा योद्धा बन जाना राजा प्रियवद को पुत्र रत्न की प्राप्ति होन… इसके अलावे भी कई चमत्कारों की कहानी कही जाती है…

चार दिन चलने वाले महापर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इसे आस्था का महापर्व इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि श्रद्धा और शुद्धता का इससे बड़ा कोई पर्व नहीं है। इस व्रत को महिलाओं के साथ ही पुरुष भी रखते हैं। चार दिनों तक चलने वाले लोकआस्था के इस महापर्व में व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है जिसमें से दो दिन तो निर्जला व्रत रखा जाता है।

 

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