आज हम जो भारत देख रहे है वो शायद अखंड न होता.. अगर सरदार पटेल न होते..आजादी के बाद भारत का एकीकरण बहुत संघर्षों के बाद हुआ..अंग्रेज जब भारत को छोड रहे थे तब भारत और पाकिस्तान नहीं बल्कि 565 रियासतें आजाद होने वाली थी.. इस बात से नेहरू और पटेल जैसे तमाम नेता काफी चिंतित थे..15 अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ तब सब से बड़ी चुनौती थी कि रियासतों को किस तरह एकत्रित किया जाए और एक साम्राज्य की स्थापना की जाए..और इस चुनौती को सरदार पटेल ने स्वीकार किया..

15 अगस्त 1947 को अंग्रेजो ने जब भारत को बटवारे के जरीए आजादी दी तब 565 रियासते भी आजाद हुई जिन्हे अंग्रेजों ने दो विकल्प दिए । या तो वे भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथे विलय कर ले या फिर स्वतंत्र हो जाय । कई नवाब स्वतंत्र होना चाहते थे, और कुछ पाकिस्तान जाना चाहते थे

6 मई 1947 में सरदार ने रजवाडो का भारत में विलय का मिशन शरू किया..और 15 अगस्त 1947 तक भारत में शामिल होने की समय सीमा भी तय कर दी..विलिनीकरण के फैसले के बाद पटेल ने 565 रियासतों के राजाओं और नवाबों को एक सशक्त भारत बनाने के लिए आहवान किया

561 रजवाडो को जोडने में सरदार की कूटनीति और राजनीति तो काम कर गई. लेकिन 15 अगस्त तक त्रावणकोर, जूनागढ, हैदराबाद और जम्मु-कश्मीर ने भारत में अपना विलय नहीं किया । अखंड भारत के निर्माण के उन महत्वपूर्ण दिनो में सरदार एकता का प्रतीक बनकर उभरे ।

statue of unity

हैदराबाद के निजाम को सरदार ने सिखाया सबक 

हैदराबाद का निजाम उस्मान अली खान विलय न करने का निश्चय कर चूका था. लेकिन हैदराबाद की जनता भारत में विलय चाहती थी तो दूसरी तरफ और निजाम ने अपनी सेना के बल पर जनता को दबाना शुरू कर दिया..निजाम ने स्वतंत्र भारत में विलय का विरोध कर ने रजाकरों की एक निजी सेना यानि मिलिशिया बनाई . जिसकी कोशिश थी रियासत को पाकिस्तान में मिला दिया जाए जिस के बाद हैदराबाद में भारत-विरोधी हलचल शरू हो गई निजाम का साथ देने पाकिस्तान से भारी मात्रा में गोला बारूद आया और मिलिशिया ने विलय के इच्छुक हिन्दुओं पर जमकर अत्याचार किए । हैदराबाद के हालात देखते हुए 12 सितंबर,1948 को पटेल ने नहेरू और इन्डियन आर्मी के खास अधिकारियों के साथ केबिनेट की बैठक बुलाई और सर्जिकल ऑपरेशन का निर्णय ले लिया इस सर्जिकल ऑपरेशन के लिए हर किसी की सहमति थी लेकिन एक सेनाध्यक्ष जनरल रॉबर्ट बूचर इस फैसले के खिलाफ थे. लेकिन सरदार अड गए और 13 सितंबर 1948 को सरदार ने भारतीय फौज को हैदराबाद पर चढाई करने का आदेश दे दिया और दो दिन में भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो के तहत हैदराबाद पर कब्जा कर लिया । निजाम सेना और मिलिशिया को इस युद्ध में भारी नुकसान उठाना पडा । दो हजार से ज्यादा रजाकरो को भारतीय सेना ने मार गिराया था. भारतीय सेना को इस कारवाई में अपने 66 जवान खोने पड़े जबकि 97 जवान घायल हुए. रजाकरों की सेना बनानेवाले कासिम रिजवी को जिंदा गिरफ्तार किया गया था.

कश्मीर के राजा हरिसिंह ने मांगी थी सरदार से मदद 

भारत की आजादी के कुछ दिन पहले लॉर्ड माउंटबेटन ने कश्मीर के राजा महाराजा हरी सिंह से कहा था कि यदि वे पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं, तो भारत कोई दखल नहीं देगा. माउंटबेटन का कहना था कि सरदार पटेल ने उन्हे इस बात का आश्वासन दिया था. लेकिन फिर कुछ एसा हुआ की सरदार ने अपने एक भाषण में कहा कि कश्मीर की एक इंच भी जमीन हम छोडने वाले नहीं.पटेल की जीवनी में लिखा है कि जब पटेल को पता चला कि पाकिस्तान ने जूनागढ़ के अपने में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है तो उनका रुख पलट गया. उस दिन से कश्मीर पटेल की प्राथमिकता बन गया था तब पटेल ने कहा था कि  जब पाकिस्तान, हिंदू बहुल आबादी वाले मुस्लिम शासक के जूनागढ़ को अपना हिस्सा बना सकता है तो भारत, मुस्लिम बहुल आबादी वाले हिंदू शासक के कश्मीर को क्यों नहीं ले सकता ?

कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तान के साथ कुछ समझौते किए थे लेकिन औपचारिक तौर पर न जूड़ने से तिलमाए पाकिस्तान ने कश्मीर के साथ व्यवहार बंध कर दिया जिसके बाद कश्मीर ने जीवन की जरूरी चीजो के लिए भारत की तरफ रूख किया । 23 अक्टूबर1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला बोल दिया । तब महाराजा ने सरदार को याद किया और उनसे मदद मांगी..साथ ही घोषणा कि यदि भारत मदद नहीं करेगा तो वो पाकिस्तान के साथ चले जाएंगे । नेहरु के विरोध के बावजूद पटेल ने मदद का हाथ बढ़ाया और भारतीय सेना ने घमासान युद्ध किया और अखिर में पाकिस्तानी सेना को पीछे हटना पड़ा

जूनागढ़ का नवाब डर के मारे भागा था पाकिस्तान 

जूनागढ़ के नवाब महाबत खान भी नहीं चाहते थे कि जूनागढ़ भारत का हिस्सा बने । मोहम्मद अली जिन्ना ने महाबत खान को अपनी रियासत को पाकिस्तान में विलय करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन जूनागढ़ की 80 फीसदी हिन्दू आबादी भारत में शामिल होना चाहती थी । बेनजीर भुट्टो के दादा शाहनवाज़ भुट्टो को जूनागढ़ का दीवान बनाया गया था. भुट्टो के दबाव के चलते महावत खाने 14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान में विलय का ऐलान कीया । इसी बीच सरदार पटेल मेनन भुट्टो से मिले और उन्हें समझाया कि जूनागढ़ हिंदुओं की बहुलता होने की वजह से उसका पाकिस्तान में विलय तर्कसंगत नहीं है.

इसी दौरान बॉम्बे में जूनागढ़ की अंतरिम सरकार बनी. इस सरकार ने जनता के साथ मिलकर और महावत खान के विरुद्ध जाकर भारत में विलय के आंदोलन को हवा दी । आरजी हुकूमत नाम से एक जन आंदोलन शुरू हुआ । परिणाम यह हुआ कि नवाब 24 अक्टूबर 1947 को अपने पालतू कुत्तो के साथ पाकिस्तान भाग गया । और बेगम को यहीं छोड़ गया भारतीय सेना ने 9 नवंबर 1947 में जूनागढ़ में घुसकर कब्जा कर लिया था ।

वीपी मेनन और पटेल के इस फैसले से माउंटबेटन नाराज़ हो गए. इसके बाद पटेल ने उनको खुश करने के लिए जूनागढ़ में वोटिंग करवाया. आपको बता दें कि ये चुनाव का आजाद भारत का पहला चुनाव था. 20 फरवरी 1948 को हुई इस वोटिंग में जूनागढ़ कि जनता ने भारत के साथ विलय कर दिया. और जूनागढ़ देश का हिस्सा बन गया.

त्रावणकोर स्टेट का कैसे हुआ विलय

जून,1947 को आजादी से कुछ महिने पहले दक्षिण के त्रावणकोर के दीवान रामास्वामी अय्यर ने त्रावणकोर को एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया..त्रावणकोर में 1934 से ही आजादी के लिए आंदोलन चल रहा था. सरदार पटेल ने काफी मनाने की कोशिश की लेकिन कुछ नही हो पा रहा था. जब पटेल के मनाने के बाद भी वो नही माने थे तो सब कुछ जनता के हाँथ में चला गया था.

जनता ने भारत में मिलने का फैसला किया था इसलिए जनता ने अपने राजा पर दबाव बनाने के लिए विद्रोह शुरू कर दिया था.. अंततः आजादी से 3 दिन पहले त्रावणकोर को भी विलीनीकरण के समजौते पर हस्ताक्षर करने पडे.

ये थी सरदार की शख्सियत..बारदोली और खेड़ा किसान आदोलन से सरदार ने इस देश में सामाजिक जीवन की शुरुवात की..और इसी आंदोलन की वजह से उन्हे सरदार की उपाधि मिली..।

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